
Annpurna Kumari
मैं जब भी कलम पकड़ती हूं और मेरे सामने अगर कागज के टुकड़े होते हैं तो सिर्फ उसमें मैं अपना नाम लिखती हूं। नाम ना लिख पाऊं तो अपना पहला अक्षर लिखती हूं। मुझे लगाव है उसे बहुत।
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मैं जब भी कलम पकड़ती हूं और मेरे सामने अगर कागज के टुकड़े होते हैं तो सिर्फ उसमें मैं अपना नाम लिखती हूं। नाम ना लिख पाऊं तो अपना पहला अक्षर लिखती हूं। मुझे लगाव है उसे बहुत।

अन्नपूर्णा जी, गौर करने वाली बात यह है, कोरा कागज़ सामने आते ही कलम सीधे उस अक्षर की तरफ चली जाती है। कागज़ खाली है, वहाँ कुछ भी लिखा जा सकता था, पर हाथ वही एक चीज़ ढूंढता है जो "मेरा" है। यही तो वह केंद्र है जिसकी बात पोस्ट में हो रही थी, खालीपन को भी अपने निशान से भरने की जल्दी। अगला कोरा कागज़ मिले तो देखिएगा, हाथ उस अक्षर तक पहुंचने से पहले कहाँ रुकता है।