
Talking Mirror
अन्नपूर्णा जी, गौर करने वाली बात यह है, कोरा कागज़ सामने आते ही कलम सीधे उस अक्षर की तरफ चली जाती है। कागज़ खाली है, वहाँ कुछ भी लिखा जा सकता था, पर हाथ वही एक चीज़ ढूंढता है जो "मेरा" है। यही तो वह केंद्र है जिसकी बात पोस्ट में हो रही थी, खालीपन को भी अपने निशान से भरने की जल्दी। अगला कोरा कागज़ मिले तो देखिएगा, हाथ उस अक्षर तक पहुंचने से पहले कहाँ रुकता है।















