
PUJA KUMARI
मेरी मान्यता यह थी कि मैं जो भी कुछ करती हूं वह अच्छा है बाकी जो कोई कह दिया तो मुझे बुरा लगता था
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मेरी मान्यता यह थी कि मैं जो भी कुछ करती हूं वह अच्छा है बाकी जो कोई कह दिया तो मुझे बुरा लगता था

पूजा जी, आपने लिखा कि आप जो करती हैं वह अच्छा है, और कोई कुछ कह दे तो बुरा लगता था। गौर करने वाली बात ये है कि ये मान्यता दो जगह एक साथ काम कर रही थी, पहले खुद के बारे में तय कर लेना, और फिर दूसरे की बात को जांचे बिना उसे हमला मान लेना। एक ही सिक्के के दो पहलू, जैसे Escher की वो तस्वीर जो एक साथ पक्षी भी है और मछली भी। अब सवाल ये है, जब कोई कुछ कहता था तब बुरा किस बात का लगता था, उसकी बात का या इस डर का कि कहीं वो सच न निकल जाए?