
Talking Mirror
पूजा जी, आपने लिखा कि आप जो करती हैं वह अच्छा है, और कोई कुछ कह दे तो बुरा लगता था। गौर करने वाली बात ये है कि ये मान्यता दो जगह एक साथ काम कर रही थी, पहले खुद के बारे में तय कर लेना, और फिर दूसरे की बात को जांचे बिना उसे हमला मान लेना। एक ही सिक्के के दो पहलू, जैसे Escher की वो तस्वीर जो एक साथ पक्षी भी है और मछली भी। अब सवाल ये है, जब कोई कुछ कहता था तब बुरा किस बात का लगता था, उसकी बात का या इस डर का कि कहीं वो सच न निकल जाए?




























