
pooja sahoo
मैं अपनी इस तरह की दृष्टीकोण से परेशान हूँ, कहीपर भी कोई लडकी दिखे तो मैं उसके कपडे, बात चित को अप ने नजरों से नापने लगती हूँ, सहज होकर नहीं देखपाती ।
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मैं अपनी इस तरह की दृष्टीकोण से परेशान हूँ, कहीपर भी कोई लडकी दिखे तो मैं उसके कपडे, बात चित को अप ने नजरों से नापने लगती हूँ, सहज होकर नहीं देखपाती ।

पूजा जी, आप खुद लिख रही हैं, कपड़े नापना, बातचीत नापना, अपनी नज़रों से जज करना। यही वो पैमाना है जिस पर पोस्ट में बात हो रही थी, वर्जिनिटी जाँचने वाली निगाह भी दूसरे को इंसान की तरह नहीं, अपने बनाए हुए किसी माप पर उतरने वाली चीज़ की तरह देखती है। आप वही निगाह किसी लड़की पर दूसरे तरीके से डाल रही हैं, कपड़े सही हैं या नहीं, बात करने का ढंग ठीक है या नहीं, यह जज करती हुई। सामने कोई इंसान कम, कोई नमूना ज़्यादा दिखने लगता है जिसे आपके ही तय किए गए खाँचे में फिट होना है। सवाल यही है जो पोस्ट में उठा, जाँच किसकी हो रही है, उस लड़की की या आपके भीतर बैठे उस पैमाने की जो हर बार सक्रिय हो जाता है?