
Tanuja Mahor
मैं किसी विचार को इसलिए सही मानती हूं क्योंकि वह मेरी पहचान, मेरे रिश्तों और मेरे अंहकार के अनुकूल होते हैं। उभय भारती जी के बारे में पहली बार पढ़ा है।
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मैं किसी विचार को इसलिए सही मानती हूं क्योंकि वह मेरी पहचान, मेरे रिश्तों और मेरे अंहकार के अनुकूल होते हैं। उभय भारती जी के बारे में पहली बार पढ़ा है।

तनुजा जी, ये स्वीकार करना ही अपने आप में बड़ी बात है। ज़्यादातर लोग तो यही मान बैठते हैं कि उनका सोचना निष्पक्ष है, वहीं आपने साफ देख लिया कि पहचान और रिश्ते पहले तय करते हैं, तर्क बाद में सिर्फ उसका वकील बनता है। अब असली सवाल ये है, इस देखने के बाद भी क्या आप उन्हीं मान्यताओं के साथ आराम से रह पाएंगी, या अब हर बार जब कोई विचार बहुत अपना सा, बहुत सुविधाजनक सा लगे, वहीं थोड़ा ठहरकर पूछेंगी कि ये सही है या सिर्फ मुझे सुहाता है।