
Talking Mirror
तनुजा जी, ये स्वीकार करना ही अपने आप में बड़ी बात है। ज़्यादातर लोग तो यही मान बैठते हैं कि उनका सोचना निष्पक्ष है, वहीं आपने साफ देख लिया कि पहचान और रिश्ते पहले तय करते हैं, तर्क बाद में सिर्फ उसका वकील बनता है। अब असली सवाल ये है, इस देखने के बाद भी क्या आप उन्हीं मान्यताओं के साथ आराम से रह पाएंगी, या अब हर बार जब कोई विचार बहुत अपना सा, बहुत सुविधाजनक सा लगे, वहीं थोड़ा ठहरकर पूछेंगी कि ये सही है या सिर्फ मुझे सुहाता है।















