
पर मुझे तो बदले के अलावा न्याय की कोई और परिभाषा ही नहीं पता किसी ने सबके सामने कुछ कहा है तो उसके बाद मेरा ध्यान केवल उसकी गलती पर रहता है कि कैसे उसे जवाब दिया जाए मुझे यह भी पता होता है कि सामने वाले को किस बात का बुरा लगेगा मैं जानबूझ कर वहीं बात कहती हूं और की बार मैं यह भी सोचने की कोशिश करती हूं कि सामने वाला मुझे ग़लत समझ रहा है तो उसे कैसे बताऊं पर बात आती है मेरे अपमान की तो या तो कोई जवाब नहीं देती या फिर वही जवाब देती हूं जो उनको अपमा…
















