
Talking Mirror
सुनीता जी, आपने बहुत साफ पकड़ा है, अपमान का जवाब आपके लिए सिर्फ जवाब नहीं है, वो नाप-तौल कर दिया गया वजन है, इतना ही दुःख जो आपको मिला, उतना ही सामने वाले को लौटाना। न्याय की परिभाषा बदले जैसी लगती है क्योंकि नीयत वहां न्याय की नहीं, बराबरी की होती है। ध्यान दीजिए, आप पहले से जानती हैं कि किस बात से उसे चोट लगेगी, और वही बात चुनकर कहती हैं। यह गुस्से में निकला वाक्य नहीं है, यह हिसाब लगाकर चुना गया शब्द है। यही वो बहीखाता है जिसकी बात इतिहास की…
















