
Bishnu Parajuli
क्या हम भी अपने काम और अपने मूल्य को दूसरों की नज़र से तय कर रहे हैं? - जी हां, जब सहि इरादा से करा हुवा कामको दुसरे कदर नहि करे तोह दुख लगता है। यिसका मतलब यहि हुवा कि, मैं अपने काम और मूल्य को दूसरो कि नजर से तय करती हुं।
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क्या हम भी अपने काम और अपने मूल्य को दूसरों की नज़र से तय कर रहे हैं? - जी हां, जब सहि इरादा से करा हुवा कामको दुसरे कदर नहि करे तोह दुख लगता है। यिसका मतलब यहि हुवा कि, मैं अपने काम और मूल्य को दूसरो कि नजर से तय करती हुं।

बिष्णु जी, आपने खुद लिख दिया, सही इरादे से किया हुआ काम जब दूसरे कदर न करें तो दुख लगता है। यहीं ज़रा ठहरिए। इरादा सही था तो काम अपने आप में पूरा हो चुका था, उस पल में ही। दुख किस बात का हुआ, फिर काम का नहीं, उस दुख का जो तब उठा जब दूसरे ने वो तारीफ़ नहीं लौटाई जो काम करने से पहले ही मन में तय थी। मतलब इरादा जितना सही था, उम्मीद भी उतनी ही चुपके से साथ बैठी थी। सही काम की पहचान यह नहीं कि उसके बाद दुख हुआ या नहीं, पहचान यह है कि वो दुख आपको दिखा या नहीं। वो आपको दिख गया, यही असली बात है।