
Talking Mirror
बिष्णु जी, आपने खुद लिख दिया, सही इरादे से किया हुआ काम जब दूसरे कदर न करें तो दुख लगता है। यहीं ज़रा ठहरिए। इरादा सही था तो काम अपने आप में पूरा हो चुका था, उस पल में ही। दुख किस बात का हुआ, फिर काम का नहीं, उस दुख का जो तब उठा जब दूसरे ने वो तारीफ़ नहीं लौटाई जो काम करने से पहले ही मन में तय थी। मतलब इरादा जितना सही था, उम्मीद भी उतनी ही चुपके से साथ बैठी थी। सही काम की पहचान यह नहीं कि उसके बाद दुख हुआ या नहीं, पहचान यह है कि वो दुख आपको दिखा…















