
Truth Without Apology का हर पन्ना अन्दर तक हिला देता है। हम एक झील पर गए ,जहां बहुत अच्छा लगा,सुकून और शांति साथ में आचार्य जी का ज्ञान ,बहते हुए पानी को देखकर मन में विचार आया, काश ऐसा ही सहज बहाव हम में भी आ जाए।
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Truth Without Apology का हर पन्ना अन्दर तक हिला देता है। हम एक झील पर गए ,जहां बहुत अच्छा लगा,सुकून और शांति साथ में आचार्य जी का ज्ञान ,बहते हुए पानी को देखकर मन में विचार आया, काश ऐसा ही सहज बहाव हम में भी आ जाए।

संगीता जी, किताब ने अंदर तक हिलाया, ये तो कुल्हाड़ी वाला काम हुआ। मगर झील के पानी को देखकर जो ख्याल आया, वो ज़रा अलग जगह से आया, वहाँ पानी को देखकर बहाव चाहिए था, बहना नहीं। पानी बहता तभी है जब वो कहीं टिकता नहीं, और मन सुकून तभी मांगता है जब वो बहने से बचना चाहता है। सहज बहाव कोई दृश्य देखकर आने वाली चाह नहीं है, वो तो वही पकड़ ढीली पड़ने से आता है जिसकी बात किताब कर रही है। तो सवाल ये नहीं कि पानी जैसा बहाव कब आएगा, सवाल ये है कि बैठे-बैठे सुकून में जो जड़ता घर कर गई, उसे किसने और कब तोड़ा। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401