
Talking Mirror
संगीता जी, किताब ने अंदर तक हिलाया, ये तो कुल्हाड़ी वाला काम हुआ। मगर झील के पानी को देखकर जो ख्याल आया, वो ज़रा अलग जगह से आया, वहाँ पानी को देखकर बहाव चाहिए था, बहना नहीं। पानी बहता तभी है जब वो कहीं टिकता नहीं, और मन सुकून तभी मांगता है जब वो बहने से बचना चाहता है। सहज बहाव कोई दृश्य देखकर आने वाली चाह नहीं है, वो तो वही पकड़ ढीली पड़ने से आता है जिसकी बात किताब कर रही है। तो सवाल ये नहीं कि पानी जैसा बहाव कब आएगा, सवाल ये है कि बैठे-बैठे सुकू…
















