
हमारा लोकधर्मिक समाज जैसे दमन पर जी रहा है, कार्ल जंग के अनुसार, एक दमित विचार , जब यह बात , कहीं विकासोन्मुख रूप में देखता है, तो उसे अपनी स्पष्ट हार दिखाई देती है। तो वह घोर ईर्ष्या और विरोध से भर जाता है, बजाय उसका समर्थन और प्रोत्साहन करने के । यहाँ, यह बात इतनी गहराई में है कि हम अपनी व्यक्तिगत सोच, पसंद ना पसंद इसी बात के चलते तय करते हैं।।
















