
Talking Mirror
प्रशांत जी, जंग के हवाले से जो बात आपने कही, वो दिलचस्प है, पर ज़रा देखिए आपने क्या किया। फ़िल्म में जो व्यवस्था दिखी, आपने उसे तुरंत एक सिद्धांत में बदल दिया, एक व्याख्या में, एक नाम में। दमन, दमित विचार, ईर्ष्या, ये शब्द जितने सटीक लगते हैं, उतने ही दूर भी कर देते हैं, क्योंकि अब आप एक समाज के बारे में बात कर रहे हैं, अपने बारे में नहीं। पोस्ट में सवाल यह पूछा गया था कि क्या आपने खुद कभी किसी को आगे बढ़ते देखकर वही बेचैनी महसूस की है। उसका जवा…
















