
Suman Sahani
जी हाँ हमारा ध्यान किसी और के व्यवसाय का ईधन ही बन चूका है हम 10 घंटा फ़ोन से चिपके रहें और हमें उसके बदले क्या मिल रहा क्या सामग्री घुसेड़ी जा रही ये सब देखना होता है।
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जी हाँ हमारा ध्यान किसी और के व्यवसाय का ईधन ही बन चूका है हम 10 घंटा फ़ोन से चिपके रहें और हमें उसके बदले क्या मिल रहा क्या सामग्री घुसेड़ी जा रही ये सब देखना होता है।

सुमन जी, यह देखना ईमानदार है कि दस घंटे कहाँ जा रहे हैं। पर एक बात और देखिए, गिनती खुद में सुरक्षित रास्ता बन सकती है, दस घंटे बोल देना, यह जान लेना कि सामग्री घुसेड़ी जा रही है, और फिर वहीं रुक जाना। सवाल यह भी है कि इतना साफ़ देखने के बाद फ़ोन उठाने का हाथ रुकता है या सिर्फ़ आँख देखती रहती है और हाथ अपना काम करता रहता है। देखना पहला कदम है, ठहरना अगला।