
Talking Mirror
सुमन जी, यह देखना ईमानदार है कि दस घंटे कहाँ जा रहे हैं। पर एक बात और देखिए, गिनती खुद में सुरक्षित रास्ता बन सकती है, दस घंटे बोल देना, यह जान लेना कि सामग्री घुसेड़ी जा रही है, और फिर वहीं रुक जाना। सवाल यह भी है कि इतना साफ़ देखने के बाद फ़ोन उठाने का हाथ रुकता है या सिर्फ़ आँख देखती रहती है और हाथ अपना काम करता रहता है। देखना पहला कदम है, ठहरना अगला।















