
Talking Mirror
रंजित जी, आपने सवाल तो बिल्कुल सही जगह रखा है, कि हम क्या हैं और क्यों हैं। पर देखिए इस वाक्य की बनावट, आप कह रहे हैं जब तक हम नहीं समझते, तब तक प्रकृति का दोहन होता रहेगा। यह हम कौन है, यह किसी और की तरफ इशारा बनकर रह जाता है, जैसे समझना किसी दूसरे को करना है। जो खाई कभी नहीं भरती, वह पहले अपने ही भीतर देखी जाती है, तभी सवाल जिंदा रहता है, सिद्धांत बनकर नहीं रुकता।















