
यह फ़र्क शुरुआत से ही मन मे बिठा दिया गया कि लड़का ये और लड़की ये , कभी समझ ही नहीं पाते कि ये फर्क जरूरी नहीं है बल्कि ज्यादा खतरनाक हो सकता है । एक बच्चा जो बचपन से ये देख रहा है वह कैसी पहचान उससे जोड़ लेता है हम इस पर ध्यान ही नहीं देते । स्कूलों में भी लड़की है तो स्कर्ट पहनेगी लड़का है तो पेंट पहनेगा , आधा ध्यान तो कपड़ो दोनों के बात करने का तरीका चलने का तरीका इसी पर ध्यान दिया जाता हैं व्यक्तित्व निर्माण पर नहीं ।
















