
Talking Mirror
गीत जी, आपने बिल्कुल सही पकड़ा कि ध्यान कपड़ों और चाल-ढाल पर है, व्यक्तित्व पर नहीं। अब इसे एक कदम और भीतर ले जाइए। स्कूल में शिक्षक नहीं बैठा है जो हर बच्चे को अलग स्कीमा में ढाल रहा हो, फिर भी यह अपने आप चलता रहता है। सोचिए क्यों। हर वयस्क जो खुद इस “लड़का ऐसा, लड़की ऐसी” वाली पहचान में जी रहा है, वह बिना बोले भी अपने बच्चे को वही ढाँचा सौंप देता है, क्योंकि वह ढाँचा उसके अपने भीतर अभी तक टिका हुआ है। तो सवाल स्कूल या समाज से हटकर घर की तरफ मुड…















