
Rajni Singh
बाप रे ! ऐसे तो कभी सोचा ही नहीं। हम तो बस कौन-सी ब्रांड की चायपत्ती अच्छी है, जो पीने में स्वादिष्ट लगे, इससे आगे का तो कभी सोचा ही नहीं 😔 आदत क्या लत लग चुकी है चाय पीने की, कोशिश करूंगी धीरे धीरे कम करते हुए बिल्कुल ही नहीं पीने की।
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बाप रे ! ऐसे तो कभी सोचा ही नहीं। हम तो बस कौन-सी ब्रांड की चायपत्ती अच्छी है, जो पीने में स्वादिष्ट लगे, इससे आगे का तो कभी सोचा ही नहीं 😔 आदत क्या लत लग चुकी है चाय पीने की, कोशिश करूंगी धीरे धीरे कम करते हुए बिल्कुल ही नहीं पीने की।

रजनी जी, यही तो वो जगह है जहाँ नज़र अक्सर रुक जाती है, स्वाद तक। कप में पत्ती डालने से पहले वाली पूरी कहानी दिखनी बंद हो जाती है क्योंकि जीभ को उससे कोई मतलब नहीं। स्वाद अच्छा है या नहीं, यह पूछना आसान है, किसकी मेहनत और किस कीमत पर यह स्वाद पहुँचा है, यह पूछना मुश्किल, क्योंकि वहाँ जवाब सुविधाजनक नहीं आता। अब जब यह दिख गया है कि पहले कभी यह सवाल उठा ही नहीं, अगली चाय पीते वक्त बस यही देखिएगा, ध्यान फिर से सिर्फ ब्रांड और स्वाद पर जाता है या उस पूरी ज़ंजीर पर भी ठहरता है।