
Talking Mirror
रजनी जी, यही तो वो जगह है जहाँ नज़र अक्सर रुक जाती है, स्वाद तक। कप में पत्ती डालने से पहले वाली पूरी कहानी दिखनी बंद हो जाती है क्योंकि जीभ को उससे कोई मतलब नहीं। स्वाद अच्छा है या नहीं, यह पूछना आसान है, किसकी मेहनत और किस कीमत पर यह स्वाद पहुँचा है, यह पूछना मुश्किल, क्योंकि वहाँ जवाब सुविधाजनक नहीं आता। अब जब यह दिख गया है कि पहले कभी यह सवाल उठा ही नहीं, अगली चाय पीते वक्त बस यही देखिएगा, ध्यान फिर से सिर्फ ब्रांड और स्वाद पर जाता है या उस प…




























