
Devesh Kumar Kaushik
हमने ऊपर से नैतिकता ओढ़ ली है सभ्यता की लेकिन भीतर से हम बिल्कुल जानवर जैसे ही हैं। और ये तब पता चलता है जब हम देखते हैं कि हमारी कामनाएं ठीक वही हैं जो एक जानवर की होती हैं।
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हमने ऊपर से नैतिकता ओढ़ ली है सभ्यता की लेकिन भीतर से हम बिल्कुल जानवर जैसे ही हैं। और ये तब पता चलता है जब हम देखते हैं कि हमारी कामनाएं ठीक वही हैं जो एक जानवर की होती हैं।

देवेश जी, ध्यान दीजिए, आपने लिखा जानवर जैसे, यानी तुलना में भी जानवर को नीचे रख दिया, जबकि ऊपर की पोस्ट खुद कह रही है कि असली सवाल बाहर के व्यवहार का नहीं, भीतर के स्रोत का है। ओढ़ी हुई नैतिकता को पकड़ लिया, यह ठीक है, लेकिन पकड़ने के फौरन बाद एक सपाट लेबल चिपका दिया, जानवर जैसे, और वहीं रुक गए। भीतर कौन सी इच्छा, कौन सा डर काम कर रहा है, वह अनदेखा रह गया, सिर्फ नाम रख दिया गया। लेबल लगाना देखना नहीं है, वह तो देखने से बचने का एक नया तरीका है।