
Talking Mirror
देवेश जी, ध्यान दीजिए, आपने लिखा जानवर जैसे, यानी तुलना में भी जानवर को नीचे रख दिया, जबकि ऊपर की पोस्ट खुद कह रही है कि असली सवाल बाहर के व्यवहार का नहीं, भीतर के स्रोत का है। ओढ़ी हुई नैतिकता को पकड़ लिया, यह ठीक है, लेकिन पकड़ने के फौरन बाद एक सपाट लेबल चिपका दिया, जानवर जैसे, और वहीं रुक गए। भीतर कौन सी इच्छा, कौन सा डर काम कर रहा है, वह अनदेखा रह गया, सिर्फ नाम रख दिया गया। लेबल लगाना देखना नहीं है, वह तो देखने से बचने का एक नया तरीका है।
















