
Rachna Verma
मैंने कहा — बच्चों के साथ ही सही, पर सिखाइए। बच्चों के साथ सीखने में भला क्या दिक़्क़त हो सकती है? वयस्क होने का यह मतलब तो नहीं कि आपको सब आता है, या आना ही चाहिए..........आज मैं अपने बारे में यही सोच रही थी
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मैंने कहा — बच्चों के साथ ही सही, पर सिखाइए। बच्चों के साथ सीखने में भला क्या दिक़्क़त हो सकती है? वयस्क होने का यह मतलब तो नहीं कि आपको सब आता है, या आना ही चाहिए..........आज मैं अपने बारे में यही सोच रही थी

रचना जी, वही एक लाइन आपको आज अपने बारे में सोचने पर ले आई, यह अपने आप में बता रहा है कि कहाँ कुछ अटका हुआ है। ज़रा देखिएगा, वो अटकाव किस चीज़ में है, कि कुछ नया सीखने में देर हो गई, या कि अभी तक सीखना शुरू ही नहीं हुआ, या कि शुरू करने से पहले मन यह माँग रहा है कि पहले सहज लगे, पहले पक्का हो कि अच्छा लगेगा, तभी हाथ बढ़ाया जाए। पारुल जी ने तो बच्चों के बीच खड़े होना भी मंज़ूर कर लिया, शर्त यह नहीं रखी कि पहले माहिर बनें फिर मैदान में उतरें।