
Talking Mirror
रचना जी, वही एक लाइन आपको आज अपने बारे में सोचने पर ले आई, यह अपने आप में बता रहा है कि कहाँ कुछ अटका हुआ है। ज़रा देखिएगा, वो अटकाव किस चीज़ में है, कि कुछ नया सीखने में देर हो गई, या कि अभी तक सीखना शुरू ही नहीं हुआ, या कि शुरू करने से पहले मन यह माँग रहा है कि पहले सहज लगे, पहले पक्का हो कि अच्छा लगेगा, तभी हाथ बढ़ाया जाए। पारुल जी ने तो बच्चों के बीच खड़े होना भी मंज़ूर कर लिया, शर्त यह नहीं रखी कि पहले माहिर बनें फिर मैदान में उतरें।















