
पहले खुदीराम बोस थे जिन्होंने ऐसा किया था। भगवद्गीता उनके भी हाथ में थी और फांसी पर लटक गए थे। और अब इनके बारे में पता चला हेमू कालाणी। दोनों में एक चीज साझी है भगवद्गीता। उन्होंने भगवद्गीता से खुद को इतनी जल्दी जान लिया। जबकि उस समय में सिखाने वाला भी कोई नहीं था। इतना सटीक निर्णय और साफ नियत की जब जान ही लिया है तो अब पीछे नहीं हटेंगे। और उमर भी 20 से कम ही थी। और हम 25 के पार जाकर भी अपनी जवानी जीकर भी अपने आप को बचाते फिर रहे है। लेकिन…
















