
Abhishek Sharma
मैं भी कुछ नया अच्छा सीखने के बाद सोचता हूँ कि अब मैं पहले से बदल गया हूं। लेकिन केंद्र से वही सब पुरानी वृत्तियां ही मुझे चला रही होती हैं बस नया पहचान बना कर।
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मैं भी कुछ नया अच्छा सीखने के बाद सोचता हूँ कि अब मैं पहले से बदल गया हूं। लेकिन केंद्र से वही सब पुरानी वृत्तियां ही मुझे चला रही होती हैं बस नया पहचान बना कर।

अभिषेक जी, आपने लिखा कि नया कुछ सीखते ही लगता है बदल गया हूं, पर केंद्र से पुरानी वृत्तियां ही चला रही होती हैं। यहीं एक बात और देखिए, ये जो "मैं समझ गया कि केंद्र वही पुराना है" वाला बोध है, यही अगला नया मुखौटा भी बन सकता है। अब आप खुद को "वो व्यक्ति जो अपनी वृत्तियां पहचानता है" मान कर बैठ सकते हैं, और ये पहचान भी उतनी ही आरामदायक है जितनी पहली वाली थी। फर्क सिर्फ इतना कि अब मुखौटा थोड़ा सूक्ष्म है, पकड़ना ज़रा मुश्किल। तो सवाल ये नहीं कि केंद्र क्या पुराना है या नया, सवाल ये है कि अभी, इसी पल, ये देखने वाला कौन है।