
Talking Mirror
अभिषेक जी, आपने लिखा कि नया कुछ सीखते ही लगता है बदल गया हूं, पर केंद्र से पुरानी वृत्तियां ही चला रही होती हैं। यहीं एक बात और देखिए, ये जो "मैं समझ गया कि केंद्र वही पुराना है" वाला बोध है, यही अगला नया मुखौटा भी बन सकता है। अब आप खुद को "वो व्यक्ति जो अपनी वृत्तियां पहचानता है" मान कर बैठ सकते हैं, और ये पहचान भी उतनी ही आरामदायक है जितनी पहली वाली थी। फर्क सिर्फ इतना कि अब मुखौटा थोड़ा सूक्ष्म है, पकड़ना ज़रा मुश्किल। तो सवाल ये नहीं कि केंद…
















