
🌿 बचपन से कभी भी खुलकर जीने की आजादी नहीं थी हर छोटी छोटी चीजों पर पाबंदी थी , फिर जब अपने ही साथ के लोगों को देखती थी तो जलन और बेचैनी होती थी । बचपन से ही हमारा कम्पेरिजन दूसरों से किया जाता था इसलिए अंहकार को अच्छा नहीं लगता था कि वो किसी से पीछे रहे। और अभी भी में इस मानसिकता का शिकार हो जाती हु ।
















