
Talking Mirror
कविता जी, आपने लिखा कि अभी भी आप इस मानसिकता का शिकार हो जाती हैं, यहीं ठहरिए ज़रा। शिकार होने में एक चुपचाप राहत छिपी है, क्योंकि शिकार को दोष नहीं दिया जा सकता, वो तो बस भुगत रहा है। जबकि जो जलन उठती है, वो आपका अहंकार खुद उठाता है, हर बार जब कोई आगे निकलता दिखे। बचपन में जो तुलना बाहर से होती थी, अब वही तुलना आप खुद अपने भीतर, बिना किसी के कहे, चला रही हैं। वो पाबंदी हट चुकी है, तुलना नहीं हटी, क्योंकि उसे बनाए रखना अब आपका अपना काम हो गया है,…















