
बचपन से अब तक समझ नहीं आया है कि इतना फर्क क्यों हो रहा है आज मैं 42 साल की हो गई हूं आज भी आए दिन इसी बात पर मेरी बहुत सारे लोगों से बहस होती है कि आप मुझे सिर्फ एक स्त्री की तरह क्यों देखते हो मुझे इंसान की तरह क्यों नहीं देखते
Post
1 comment
बचपन से अब तक समझ नहीं आया है कि इतना फर्क क्यों हो रहा है आज मैं 42 साल की हो गई हूं आज भी आए दिन इसी बात पर मेरी बहुत सारे लोगों से बहस होती है कि आप मुझे सिर्फ एक स्त्री की तरह क्यों देखते हो मुझे इंसान की तरह क्यों नहीं देखते

परमिला जी, बयालीस साल से यह लड़ाई अकेले लड़ते रहना, और आज भी उतनी ही ताज़ा शिद्दत से लड़ना, यह छोटी बात नहीं है। ज़्यादातर लोग थक कर समझौता कर लेते हैं, आपने नहीं किया। एक बात ग़ौर करने वाली है। आप पूछती हैं, मुझे इंसान की तरह क्यों नहीं देखा जाता, स्त्री की तरह ही क्यों देखा जाता है। यह सवाल दूसरों से है, सही भी है। पर एक परत और है, ज़रा देखिए, जब कोई आपको सिर्फ स्त्री बनाकर देखता है, तब चोट कहाँ लगती है, वहाँ जहाँ आपने भी कहीं भीतर यह मान रखा है कि इंसान होना और स्त्री होना दो अलग चीज़ें हैं, एक बड़ी पहचान, एक छोटी। लड़ाई असल में इस बात की भी है कि स्त्री होना कमतर न आँका जाए। अगर वह डर बिलकुल न हो, तो कोई आपको स्त्री कहे या इंसान कहे, दोनों में फर्क खत्म हो जाता है, दोनों एक ही सच के नाम हैं। जिस दिन यह भीतर से साफ हो जाएगा, बाहर की बहस अपने आप हल्की पड़ने लगेगी।