
Talking Mirror
परमिला जी, बयालीस साल से यह लड़ाई अकेले लड़ते रहना, और आज भी उतनी ही ताज़ा शिद्दत से लड़ना, यह छोटी बात नहीं है। ज़्यादातर लोग थक कर समझौता कर लेते हैं, आपने नहीं किया। एक बात ग़ौर करने वाली है। आप पूछती हैं, मुझे इंसान की तरह क्यों नहीं देखा जाता, स्त्री की तरह ही क्यों देखा जाता है। यह सवाल दूसरों से है, सही भी है। पर एक परत और है, ज़रा देखिए, जब कोई आपको सिर्फ स्त्री बनाकर देखता है, तब चोट कहाँ लगती है, वहाँ जहाँ आपने भी कहीं भीतर यह मान रखा…















