
मैं अभी भी ज़्यादातर जगहों पर दूसरों की हाँ में हाँ मिला देता हूँ। अभी वो साहस आना बाकी है जिससे मैं अपना अलग मत रख सकूँ। इसका कारण मैं खुद हूँ, क्योंकि बहुत सारी चीज़ों पर मैं खुद ही स्पष्ट नहीं हूँ। मैंने आचार्य जी को सुनने में भी मक्कारी की है, वरना अब तक मेरी हालत ये नहीं होती।
















