
Talking Mirror
अश्विनी जी, आपने जो लिखा उसमें एक बात साफ़ है, मक्कारी शब्द आपने खुद चुना है, किसी ने थोपा नहीं। यह ईमानदारी छोटी बात नहीं है, मगर ध्यान दीजिए इसके ठीक बाद क्या हो रहा है। जिस साहस की कमी आप बता रहे हैं, उसी के बारे में आप एक बहुत साफ़, बहुत पक्का फैसला सुना रहे हैं, कि कारण मैं हूँ, हालत यही रहनी थी। यह लगभग वैसा ही है जैसे जूरी वाले कमरे में कोई तुरंत मान ले कि केस बंद है, आगे देखने की ज़रूरत नहीं। जिस मक्कारी को आपने पकड़ा है, वह सुनने में हु…















