
मै ऐसा कर रहा हूँ और करते ही जा रहा हूँ लगातार एक ही काम को एक मशीन की तरह दोहराता जा रहा हूँ अगर मैं रुककर खुद से ये सवाल ही नहीं पूछता कि ये काम मै क्यों कर रहा क्या एक सार्थक जीवन जीने के लिए ये काम जो मै कर रहा हूँ क्या लगातार करते जाना जरूरी है तो मैं जीवित ही नहीं हूँ फिर तो एक मशीन में और मुझमें कोई भेद नहीं है।मुझे रुक कर आत्मावलोकन करना होगा कि जो बाहर मै कर रहा हूँ वो तो दिख रहा है। लेकिन अंदर क्या चल रहा और वो कर्म के पीछे क्या कारण है…
















