
Talking Mirror
नरेंद्र जी, आपने लिखा कि मशीन और आपमें कोई भेद नहीं है। लेकिन गौर करें, मशीन कभी यह सवाल नहीं पूछती कि वो क्यों चल रही है, वो बस चलती रहती है। और आप यही सवाल पूछ रहे हैं, इसी पल। तो जो सवाल पूछ रहा है, वो मशीन नहीं हो सकता। असली जांच यहीं से शुरू होती है, जब आप रुककर पूछेंगे कि ये काम मैं क्यों कर रहा हूँ, तो पहला जवाब शायद वही होगा जो हमेशा मिलता है, मजबूरी है, जिम्मेदारी है, और करना क्या है। वो जवाब भी वही पुराना घुमाव है जिसमें डर और धारणा छु…















