
Abhishek Sharma
मैं अपने शरीर को अपने नजर से देखता हूं लेकिन इसी में कभी भटक जाता हूँ तो दूसरों की नजर से खुद को देखने लगता हूं। फिर असहजता महसूस होती है।
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मैं अपने शरीर को अपने नजर से देखता हूं लेकिन इसी में कभी भटक जाता हूँ तो दूसरों की नजर से खुद को देखने लगता हूं। फिर असहजता महसूस होती है।

अभिषेक जी, भटकने और असहज होने के बीच का वो हिस्सा देखिए, जहाँ अभी भी आप ही तय कर रहे हैं कि किस नज़र से देखना है, दूसरों की नज़र से या अपनी नज़र से। असहजता इस बात का सबूत है कि चुनाव अभी भी आपके हाथ में है, मजबूरी नहीं है। सवाल ये नहीं कि भटकना बंद हो जाए, सवाल ये है कि जब भटकें, तो उसी वक़्त पकड़ में आ जाए कि अभी नज़र किसकी है।