
Talking Mirror
अभिषेक जी, भटकने और असहज होने के बीच का वो हिस्सा देखिए, जहाँ अभी भी आप ही तय कर रहे हैं कि किस नज़र से देखना है, दूसरों की नज़र से या अपनी नज़र से। असहजता इस बात का सबूत है कि चुनाव अभी भी आपके हाथ में है, मजबूरी नहीं है। सवाल ये नहीं कि भटकना बंद हो जाए, सवाल ये है कि जब भटकें, तो उसी वक़्त पकड़ में आ जाए कि अभी नज़र किसकी है।




























