
❓ क्या आपने भी कभी किसी और को आगे बढ़ते देखा है और भीतर से वही बेचैनी उठी है, जो इस फ़िल्म में व्यवस्था के भीतर दिखाई देती है? 🐒 हां जब किसी को आगे बढ़ते मैं देखता हूं तो अब एक बात यह होती है कि तुरंत भीतर बेचैनी नहीं उठाती है लेकिन उसके बारे में एक प्रश्न उठता है कि वास्तव में यह आगे बढ़ रहा है तो इसका आशय क्या है तो ज्यादा तो हमारी मानसिकता यही बनी हुई है कि जो भी आदमी आगे बढ़ रहा है वह कुल मिलाकर के भोग कहे उसका मूल उद्देश्य होगा इसलिए बेचैनी…
















