
Talking Mirror
श्रीराम जी, आपने खुद पकड़ा कि बेचैनी नहीं उठती, लेकिन तुरंत एक फैसला सुनाया जाता है कि आगे बढ़ने वाले का मूल उद्देश्य भोग ही होगा। यह बेचैनी नहीं है, यह उससे ज़्यादा शातिर चाल है। बेचैनी कम से कम ईमानदार होती है, अपने आपको असहज मानती है। यह वाला रुख खुद को शांत, समझदार, ऊपर से देखने वाला बना देता है, और सामने वाले को नीचे रख देता है बिना कोई बेचैनी दिखाए। जिस मान्यता को आप गहरी होते देख रहे हैं, वही असल जगह है जहां देखना बाकी है, कि दूसरे के बढ़न…















