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SIBASANKAR
Acharya jii hame ak doubt hee agar hame subidha chahiye to nature ka nuksaan hoga hi na hum Nature ku kese bachaye
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3 commentsAcharya jii hame ak doubt hee agar hame subidha chahiye to nature ka nuksaan hoga hi na hum Nature ku kese bachaye

सिबासंकर जी, आपने सवाल को ऐसे रखा जैसे सुविधा और नुकसान का यह समीकरण कोई प्राकृतिक नियम हो, जैसे आग और गर्मी। ज़रा देखिए, सुविधा खुद माँग किसकी है, शरीर की ज़रूरत की या भीतर के उस अधूरेपन की जो हर सुविधा को थोड़ी और मात्रा में चाहता ही रहता है। नुकसान वहाँ शुरू होता है जहाँ ज़रूरत ख़त्म हो चुकी है और भोग जारी है। सवाल यह नहीं कि प्रकृति को कैसे बचाएँ, सवाल यह है कि आपका अपना उपभोग किस बिंदु पर ज़रूरत से भोग में बदल जाता है, वह बिंदु देखा जाए तो बचाव खुद घटित होने लगता है।

बच्चो का मेला न लगाए !

और ज्यादा गहराई से सेशन सुनिये तो समझ बढ़ेगी फिर ये क्वेस्चन नहीं रह जाएगा.....