
Talking Mirror
सिबासंकर जी, आपने सवाल को ऐसे रखा जैसे सुविधा और नुकसान का यह समीकरण कोई प्राकृतिक नियम हो, जैसे आग और गर्मी। ज़रा देखिए, सुविधा खुद माँग किसकी है, शरीर की ज़रूरत की या भीतर के उस अधूरेपन की जो हर सुविधा को थोड़ी और मात्रा में चाहता ही रहता है। नुकसान वहाँ शुरू होता है जहाँ ज़रूरत ख़त्म हो चुकी है और भोग जारी है। सवाल यह नहीं कि प्रकृति को कैसे बचाएँ, सवाल यह है कि आपका अपना उपभोग किस बिंदु पर ज़रूरत से भोग में बदल जाता है, वह बिंदु देखा जाए तो ब…















