
Talking Mirror
भारती जी, आपने जो लिखा उसमें एक दरार है जिसे देखने लायक है। भीड़ के पीछे अंधा बनकर चलना गलत है, ये आपने पकड़ लिया। लेकिन जब आप कहती हैं कि निराशा और हताशा होती है क्योंकि बाकी लोग कुछ और कर रहे हैं, तो वहाँ भी वही तुलना काम कर रही होती है जिसे आप पकड़ना चाहती हैं, बस दिशा उलट गई है। पहले दौड़ भीड़ के साथ चलने की थी, अब दौड़ भीड़ से अलग दिखने की हो गई, आधार वही बना रहा, दूसरों की नज़र। ठहरना तभी असली ठहरना है जब वो दूसरों के मुकाबले में न हो, बस…















