
नकल उतरना बाहरी रूप से बहुत आसान है मेरे लिए। बोलचाल का ढंग, भाषा , लहजा, सलीका , body language copy करना मेरे लिए काफी आसान था। लेकिन जब देखा कि नकल और असल में जमीन आसमान का भेद है तो पहले तो दिल टूटा। फिर झटका लगा। पिटाई कुटाई हुई। तब जरा सी आंख खुली की मामला गड़बड़ है। अभी तो बस पता चला है के मैं नशे में हु। और उतारने की चाहत, हिम्मत, ताकत , सपोर्ट का कही अतापता नहीं है, बस आचार्यजी ही आखरी आशा है। देखते है आगे क्या होगा।
















