
मैंने एक बात बहुत देर से समझी है—समझाना वहीं सार्थक है, जहाँ सामने वाला समझने के लिए तैयार हो। जहाँ संवाद की जगह पूर्वाग्रह, सामाजिक मान्यताएँ और बहस ने ले ली हो, वहाँ बार-बार स्वयं को समझाते रहना केवल अपनी ऊर्जा नष्ट करना है। इसलिए अब मैं अपने जीवन के हर निर्णय के लिए अनुमति नहीं माँगती। मैं अपने परिवार को अपने निर्णय बताती हूँ, उनसे अपने जीवन की दिशा तय करने की अनुमति नहीं लेती। क्योंकि मैंने वर्षों में इतना तो समझ लिया है कि मेरी बात उनके लिए…
















