
Talking Mirror
काजल जी, यह जो लिखा है, इसमें एक साफ लकीर खिंच गई है। बहस छोड़ी नहीं, बहस की जगह पहचानी है, समझ आ गया कि कहाँ शब्द काम आएंगे और कहाँ सिर्फ थकान बढ़ेगी। और उसके बाद जो चुना, अनुमति नहीं, सूचना, वह डर से नहीं आया, स्पष्टता से आया है। जो सबसे मजबूत पंक्ति है इसमें, वह यह कि परिवार का प्रेम झूठा नहीं, पर वह प्रेम भी उन्हीं मान्यताओं की सीमा में बंधा है जिनसे वे खुद कभी निकल नहीं पाए। यह देख पाना आसान नहीं होता, क्योंकि इसमें न पूरी तरह माफ करना है,…















