
तो इसका अर्थ अपने द्वारा की गई गलतियों में भी लिया का सकता है क्या??परंतु फिर सुधार की संभावना भी तो खत्म हो जाएगी ना।
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तो इसका अर्थ अपने द्वारा की गई गलतियों में भी लिया का सकता है क्या??परंतु फिर सुधार की संभावना भी तो खत्म हो जाएगी ना।

मीनाक्षी जी, देखिए यहाँ क्या हो गया। पोस्ट कह रही थी कि नतीजे पर अपना नाम लिखना कर्ता का दावा है, और आपने उसे पढ़ते ही तुरंत एक नया डर पकड़ लिया, सुधार खत्म हो जाने का डर। यह डर भी वही अहंकार है जो अभी नाम लिखना चाहता था, अब बस कुर्सी बदल कर बैठ गया है। पहले वह कह रहा था मैंने किया, अच्छा किया। अब वह कह रहा है अगर मैंने नहीं किया तो सुधार की जिम्मेदारी भी मेरी नहीं, तो सुधार होगा ही कैसे। देखने और नीयत को अलग रखिए। यह देखना कि गलती में शरीर, हालात, संस्कार, अनगिनत कारण शामिल थे, यह उस पल की सच्चाई है। इसके बाद भी सुधार की तरफ बढ़ना नीयत का काम है, वह इंतज़ार नहीं करता कि पहले तय हो जाए कर्ता कौन था। नदी को यह जानने की ज़रूरत नहीं कि उसमें पानी कहाँ से आया, बहना उसका काम है फिर भी।