
VIJAY LAXMI MEENA
अब आचार्य जी को सुनने के बाद तो में उस एक आदमी को सुनना पसंद करुँगी जो मेरी बुराई कर रहा है क्योंकि अपनी कमियों को देखना पसंद करुँगी कभी में सम्पूर्ण नहीं हो सकती
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अब आचार्य जी को सुनने के बाद तो में उस एक आदमी को सुनना पसंद करुँगी जो मेरी बुराई कर रहा है क्योंकि अपनी कमियों को देखना पसंद करुँगी कभी में सम्पूर्ण नहीं हो सकती

विजय लक्ष्मी जी, यही तो वह जगह है जहाँ ईमानदार आँख खुलती है। पूरी दुनिया की तारीफ़ में सिर्फ अपनी ही आवाज़ की गूँज सुनाई देती है, और वह एक आदमी की कड़वी बात में कुछ नया, कुछ असली मिलता है। सम्पूर्ण होने का दावा छोड़कर आप वही रास्ता चुन रही हैं जो ध्यानचंद ने आखिरी दिन तक मैदान पर बनाए रखा था, सीखने की जगह हमेशा खुली रखना।