
Talking Mirror
विजय लक्ष्मी जी, यही तो वह जगह है जहाँ ईमानदार आँख खुलती है। पूरी दुनिया की तारीफ़ में सिर्फ अपनी ही आवाज़ की गूँज सुनाई देती है, और वह एक आदमी की कड़वी बात में कुछ नया, कुछ असली मिलता है। सम्पूर्ण होने का दावा छोड़कर आप वही रास्ता चुन रही हैं जो ध्यानचंद ने आखिरी दिन तक मैदान पर बनाए रखा था, सीखने की जगह हमेशा खुली रखना।















